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पलकों की वादियों में नीदों की शाखों पे

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लगता था तुम आओगे

  लगता था तुम आओगे इश्क़ के धागे में बँधकर   दिल के हाथों बेबस होकर खामोश निगाहों से मुझको अपना हाल सुनाओगे.... फिर पहचानोगे दर्द मेरा    और सूखे होंठों के लम्स को अपनी ऊँगली की पोरों में भरकर अपने लब से लगाओगे....   लगता था तुम आओगे शरद 

इलाहाबादी होली की कसक

  होली... एक ऐसा त्योहार जिसकी मस्ती और उमंग का आलम आप किसी इलाहाबादी से पूछिए तो वो बताएगा आपको लोकनाथ चौराहे पर बिजली के तारों पर टंगे फटे चीथड़े कपड़ों की दास्तान , भांग की मस्ती में डूबा हुआ नाचता शहर, हर चौराहे पर बजता हुआ होली के रंग में सराबोर संगीत, कहीं भौजाइयों के रंग से पुते हुए दांत तो कहीं देवरों की पीठ और कमर के नीचे तक लगा हुआ रंग , लोगों को उठा उठाकर पानी की टंकी में डुबोने और आते जाते लोगों पर बाल्टी दर बाल्टी पानी फेंकने का सिलसिला ... यहीं रुकती नहीं है कहानी बल्कि शुरू होती है... शुरू होती है होली के बहाने प्रियतम को छूने और छेड़ने की कोशिश... गुब्बारे मारकर किसी की गालियां खाने का आनंद... नहा लेने के बाद पक्के रंग फिर से लगा के भाग जाने की आदत, गुझिया पापड़, मठरी के साथ साथ अबीर गुलाल के साथ गले मिलने की रवायत और न जाने कितना ही कुछ। और ऐसा ही एक इलाहाबादी जब सैकड़ों मील दूर बैठा इन सारी रौनकों से महरूम हो तो कभी कभी लगता है कि शायद जिस जिंदगी की तलाश करते करते हम इतनी दूर निकल आए हैं, वो तो वहीं छूट गई है किसी चौराहे पर, किसी गली में, किसी छत पर, किसी निगाह मे...