इलाहाबादी होली की कसक

 होली... एक ऐसा त्योहार जिसकी मस्ती और उमंग का आलम आप किसी इलाहाबादी से पूछिए तो वो बताएगा आपको लोकनाथ चौराहे पर बिजली के तारों पर टंगे फटे चीथड़े कपड़ों की दास्तान , भांग की मस्ती में डूबा हुआ नाचता शहर, हर चौराहे पर बजता हुआ होली के रंग में सराबोर संगीत, कहीं भौजाइयों के रंग से पुते हुए दांत तो कहीं देवरों की पीठ और कमर के नीचे तक लगा हुआ रंग , लोगों को उठा उठाकर पानी की टंकी में डुबोने और आते जाते लोगों पर बाल्टी दर बाल्टी पानी फेंकने का सिलसिला ... यहीं रुकती नहीं है कहानी बल्कि शुरू होती है... शुरू होती है होली के बहाने प्रियतम को छूने और छेड़ने की कोशिश... गुब्बारे मारकर किसी की गालियां खाने का आनंद... नहा लेने के बाद पक्के रंग फिर से लगा के भाग जाने की आदत, गुझिया पापड़, मठरी के साथ साथ अबीर गुलाल के साथ गले मिलने की रवायत और न जाने कितना ही कुछ।

और ऐसा ही एक इलाहाबादी जब सैकड़ों मील दूर बैठा इन सारी रौनकों से महरूम हो तो कभी कभी लगता है कि शायद जिस जिंदगी की तलाश करते करते हम इतनी दूर निकल आए हैं, वो तो वहीं छूट गई है किसी चौराहे पर, किसी गली में, किसी छत पर, किसी निगाह में या किसी खुशबू में।
होली अब भी आती है लेकिन जो रंगों की जो खुशबू अपनी छत पर खड़े होकर आती थी, वो कहीं नहीं मिलती। जो रंग छुड़ाने के लिए उबटन लगा कर नहाने का आनंद छत पर आता था, वो अब नहीं आता।
दो दिन होली रहती थी। इसलिए अब एक दिन या कहें की एक घंटे की होली से मन नहीं भरता।
अब वो फक्कड़ इलाहाबादी भी इन सभ्यों की भीड़ में न जाने कहां गुम हो गया है । कभी कभी इस सभ्यता की घुटन से निकल कर एक दिन के लिए हुडदंग की आज़ादी को जी लेने का मन करता है। एक दिन के लिए हर औपचारिकता, हर तकल्लुफ को दरकिनार कर बेतकल्लुफी से जीने का दिल करता है।
समय के साथ इंसान का किरदार बदल जाता है लेकिन फिर भी जो एक बचपन जिंदा रहता है न उसके मन में, वही उसे जीने और हंसने का बहाना देता है।
भले ही अब शरारत न करता हो मगर
मेरे भीतर का बच्चा शायद ज़िंदा है अभी

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